क्यूँ करते हो ये शिकवाकि थोडा और बरस लेने दोजीवन की प्यास बुझने दोमझधार में ना यूँ कश्ती छोडोकि किनारे तक मुझे खेने दोडूबने का डर नहीं मुझेना ही जीने की है तमन्नासोचता हूँ गर कभीतो देखता हूँ तेरा ही सपना
अश्रु जो बहे मेरी आँखों सेकह गए मेरे ह्रदय की गाथाजिस पथ चले वो पी कर हाला पिरो गए मेरी व्यथा की मालासंजों कर रख सके इसेनहीं मिला जग में कोईअश्रु जो बहे मेरी आँखों सेकह गए मेरे ह्रदय कि गाथाना तू मेरी ना ये जग मेरायही मेरे जीवन का फेराशुन्य बन गया ये जीवन …
जब ह्रदय में हो पीड़ाजब मन में हो घृणादिखे हर और जब अंधियाराबहती है नैनों से अश्रुधारा नहीं हो काबू जब क्रोध परकठिन लगे जब राह हरकठोर हो अपने जैसे है धराबहती है नैनो से अश्रुधारा विचारों का हो जब अतिक्रमणकरे जब मष्तिष्क अत्यधिक भ्रमणना दिखे जीवन में कोई और चाराबहती है नैनो से अश्रुधारा …
रे मनवा न सुन तू इस जग कीबना घरोंदा बुन इन तिनको कोनहीं व्यर्थ होगा परिश्रम तेरा नहीं कोई इसमें समय का फेरा प्रेम न तू अपने स्वप्न से करकि स्वप्न तो आते हैं अंधियारे मेंरे मनवा बना घरोंदा तू तिनकों सेऔर पा फल तू अपने परिश्रम से भटक न होकर निराश हार सेकि पथरीला …
शब्दों के मर्म को समझो यही किताबों की भाषाआँखों के भाव को समझो यही उनकी अभिलाषाजानना किसीको नहीं है इतना कठीनचेहरा उनका सब बोलता है आँखों के अधीन लिखता नहीं मैं यूँ ही ये पंक्तियाँइनमें ही में भाव व्यक्त करताशब्दों को जो तुम पढते, समझो उनके मर्म कोआँखों में जो तुम देखते, समझो उनके कर्म …
काफी दिनों से मन में गुबार थातिरंगे की कहानी का अम्बार थाकि सोचा बहुत कैसे कहूँलेकिन दर्द ऐसा है कब तक सहूँ हुआ कुछ यूँ कि तिरंगा मिला सपने मेंकहानी थी उसकी इतनी सर्दना थी उसमें हद्दअब कैसे सहूँ में ये दर्द तिरंगा खुश होता गरउसे शहीद पर चढ़ाया जाएउसे लाल किले कि प्राचीर पर …
आज के दौर में हर किसी को बहुत कुछ पाने कि चाह है और इस चाह में उन्हें अपनों का ध्यान नहीं, ना ही उनके पास वक़्त है अपनो के लिए| इस कविता में कवी ने उसे बड़े ही नायब तरीके से ज़ाहिर किया है| ये कविता किसने लिखी ये मुझे इल्म तो नहीं, लेकिन …
शत शत नमन है उस वीर कोजीवन जिसने अपना बलिदान कियामातृभूमि के सम्मान मेंसर्वस्व अपना त्याग दियानिडर निर्भीक हो करशत्रु पर उसने वार कियाविजय की और अग्रसर होइसी सोच का आलाप कियाशत शत नमन है उस वीर कोमातृभूमि की रक्षा मेंजिसने जीवन का परित्याग कियाअभिनन्दन है उस वीर कोरक्त से अपने विजय तिलक जिसने मातृभूमि …
प्रखर प्रभद्ध ललाट पर रक्तिम तिलक की छाप हैयुद्ध को अग्रसर वीर अश्व पर सवार हैहाथ में लिए वो खडग, कृपाण, कटार है नेत्रों के उसकी मातृभूमि का सम्मान है मस्तक पर उसके रणविजय का प्रताप हैकालसर्प सी लहराती उसकी तलवार हैकटार पर उसकी विजय की धार हैबाजुओं में लिए विजय का प्रमाण है धरा …
वर्षा ऋतू में क्या कहेंजीवन में हुई हलचल हैकाली इन घटाओं को देखतुम्हारी घनी लटों का आभास हुआयूँ बूंदे जब गिरी वृक्षों परतुम्हारे आलिंगन का आभास हुआनाचते मयूर को देखये ह्रदय भी पागल हुआवृक्षों से गिर जब धरती में सिमटी बूँदेंमेरे अंतर्मन में तेरे ही नाम कि पुकार हुईपानी जब पहुँचा धरातल मेंसींचा हर जड़ …