जीवन अन्धकार

उजाला चहुँ और है, चहुँ और जले हैं दीप
फिर भी जीवन अंधकारमय क्यों है
निस्वार्थ जीवन यापन के जोग में
क्यों प्रेम स्वार्थ का भय तड़पाता है

जीवन डगर पर पित्र प्रेम का पक्ष है
ह्रदय के किसी कोने में प्रेयसी की आस
क्यों इस जीवन में इतनी द्विविधा है
क्यों पूर्ण उजाले में जीवन अंधकारमय है

चंद प्रश्न चंद सवाल क्यों हैं जीवन में
क्यों  है भविष्य का इतना डर
क्यों नहीं दिखता जीवन में शान्ति का स्वरुप
क्यों नहीं उगता जीवन में भाग्य का सूरज

क्यों जीवन अंधकार में धैर्य परिक्षा लेता है
क्यों हर जीवन में बलि और त्याग देना होता है
जीवन में निष्पक्ष और निस्वार्थ रहना
क्यों  इतना अंधकारमय और इतना कठिन है

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